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जोधपुर में कला व संस्कृति को नया आयाम देने के लिए एक मासिक हिंदी पत्रिका की शरुआत, जो युवाओं को साथ लेकर कुछ नया रचने के प्रयास में एक छोटा कदम होगा. हम सभी दोस्तों का ये छोटा-सा प्रयास, आप सब लोगों से मिलकर ही पूरा होगा. क्योंकि कला जन का माध्यम हैं ना कि किसी व्यक्ति विशेष का कोई अंश. अधिक जानकारी के लिए हमें मेल से भी संपर्क किया जा सकता है. aanakmagazine@gmail.com

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Tuesday, 12 May 2015


छत का पंखा तेज़ गति से चल रहा था .. नवम्बर के आखिरी दिन थे और ऐसी कोई गर्मी भी अब नहीं थी। लेकिन ऐसे  में भी  वीरेन के माथे से  पसीना बह रहा था। उसकी आँखें छत के पंखे को घूर रही थी, एकटक ... कमरे में जीरो बल्ब जल रहा था जिसकी हलकी रौशनी में उसका भावहीन  चेहरा   और पथराई आँखें एक डरावना  दृश्य बना रही थी।  अचानक वो उठा,  एक झटके से और तेज़ क़दमों से अपने फ्लैट से बाहर निकल गया .. चलता गया .. सड़क पर भीड़ है, ट्रैफिक का शोर है पर वीरेन को कुछ नहीं दिख रहा .. कोई उसे नहीं देख रहा । किसी ने उसकी तरफ ध्यान भी नहीं दिया।  वो चलता गया , कोई उस से टकराया तक नहीं .. सब जैसे  आज वीरेन से नज़र बचा कर, अपना कंधा बचा कर ही निकल रहे थे। आज वीरेन अकेला है .. आज इतनी बड़ी दुनिया में  उसका एक छोटा सा कोना भी नहीं।  ऐसा कैसे और क्यों हो गया ... क्या गलत हो गया .. कौन गलत था .. कौन, कितना गलत या सही था .. और अब आगे ?? और जो पिछला बीत गया .. ?? क्या सब बीता हुआ वक़्त हो गया ? क्या कुछ नहीं लौटेगा ? क्या कोई भी नहीं लौटेगा ?  क्या कभी कोई मुझसे फिर से बात नहीं करेगा वैसे ही जैसे पहले था ?  क्या, क्यों, कैसे ??? सवाल ही सवाल .. बवंडर सा मचा है उसके अन्दर .. उसका दिमाग चकराने लगा है ... लगता है जैसे अभी  गिर पड़ेगा .. पर वीरेन चलता गया .. उसका गला सूख रहा है ... नवम्बर की गुलाबी सर्दी की जगह जून की तपती दोपहर ने उसके शरीर और आत्मा को घेर लिया है .. उसकी आँखें सड़क पर फिसल रही है पर कहीं रूकती नहीं .. आखिर उसे रुकना पड़ा .. पैर कहीं टकराया है, शायद पत्थर है .. उसका सर घूम रहा है ..


वीरेन कब घर वापिस लौटा उसे खुद  ही खबर नहीं .. कैसे लौटा, नहीं पता .. वही बिस्तर है, छत का पंखा और उसको घूरती दो आँखें .  पिछले चार दिन से यही चल रहा है .. दोस्तों, परिवार वालों को नहीं पता कि  वीरेन कहाँ है .. उसके फोन पर मिस्ड कॉल्स और sms की संख्या बढती ही जा रही है .. पर उसने एक बार भी नहीं देखा ... खुद वीरेन को नहीं पता कि वो खुद कहाँ है .. लेकिन  ऋचा इस समय   कहाँ है , ये उसे ज़रूर पता है ... और उसे सवाल पूछने हैं ऋचा से .. पूछ भी चुका  है पर जितने जवाब सुनता है उतना ही उसके अन्दर के  तूफ़ान की चीखें बढ़ने लगती हैं।  


"
क्या सिर्फ यही वजह है? क्या सिर्फ यही स्पष्टीकरण है तुम्हारे पास? और वो सात साल उनके लिए क्या कहोगी ? ये सब तुमने पहले नहीं सोचा था या तुम्हे पता नहीं था ? "

"
देखो वीरेन , तुम जानते हो मुझे .. मैं अपनी सारी  ज़िन्दगी यहाँ नहीं गुजारना चाहती ... इतनी पढ़ाई लिखाई और उस पर इतना इन्वेस्टमेंट क्या यहाँ भारत में रहने के लिए किया था ..मैंने कभी नहीं सोचा था  कि  तुम अपने अच्छे  खासे  करियर और नौकरी के अवसरों  को छोड़ कर मध्यप्रदेश के किसी छोटे से शहर में  ये फॅमिली बिज़नेस  संभालने के लिए चले आओगे ।" क्या तुम कह सकते हो कि  तुम वही वीरेन हो जिस से मैंने कॉलेज में प्यार किया था ?"

"
लेकिन ऋचा ये कोई मामूली बिज़नेस  तो नहीं .. पैसा है, पोजीशन है,  स्टेटस है सोसाइटी में .. और क्या चाहिए ?"

"
मुझे यहाँ नहीं रहना .. जैसी ज़िन्दगी मुझे चाहिए वो तुम मुझे नहीं दे सकोगे। ज़रा देखो इस disgusting  शहर को ... क्या मैं यहाँ रहूंगी ? मैं अपनी लाइफ स्टाइल क्या तुम्हारे इस नए एडवेंचर या वेंचर के लिए बदल डालूँ ... क्या मैं अपनी सारी   ज़िन्दगी यहाँ इन मुर्गीखानों में गुज़ार दूँगी? "

"
नहीं वीरेन, मुझसे ये नहीं होगा .."

और ऋचा चली गई, कनाडा .. अपने पति के साथ, जो वहाँ का परमानेंट सिटीजन कार्ड होल्डर भी है।   


सब बेकार है, बकवास है, a big bullshit ..
वीरेन अपने आप में ही बोले जा रहा है .. छत का पंखा वैसा ही तेज़ चल रहा है।  उसका चेहरा विवर्ण  होता जा रहा है .. आईने के सामने खडा वो चीख रहा है, उसी पागलपन की हालत में उसने कांच को जोर से मार कर तोड़ दिया .. उसके हाथ और बांह से खून बहने लगा  और  तभी एक धारदार कांच का टुकड़ा उसने अपने हाथ में उठा लिया .. और शायद वो टुकड़ा अभी अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ता इसके पहले ही दरवाजे पर घंटी बजी । और ऐसा लगा जैसे वीरेन एकदम से किसी गहरी नींद से जागा हो .. कांच का टुकड़ा हाथ से गिर गया .  कुछ देर बाद जाकर उसने दरवाजा खोला ... वहाँ अब कोई नहीं था।


"
बेटा  कब तक ऐसा चलेगा .. कब तक तू ऐसे ही .."

"
प्लीज माँ .."

"
अच्छा , सुन  आज मुझे आश्रम जाना है तू भी चलेगा साथ में?"
"मैं??"

और यही कोई एक घंटे के वाद  वीरेन  माँ के साथ एक बड़े से हॉल में बैठा किसी गेरुए वस्त्र पहने, हलकी दाढ़ी और गेरुए कपडे से ही सर को ढके हुए,  किसी उम्रदराज लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति का प्रवचन सुन रहा था। कहना मुश्किल है कि  वीरेन सच में सुन रहा था या सिर्फ देख रहा था या खुद में ही कहीं गुम  था . आखिर प्रवचन भी ख़त्म हो गया, सबको प्रसाद दिया गया और जब वो गेरुए कपड़ों वाला आदमी भी जाने लगा तो वीरेन की माँ ने उसे जाकर कुछ कहा और फिर इशारे से वीरेन  को भी बुलाया.  वे श्रीमान  थोड़ी देर तक कुछ कहते रहे समझाते रहे वीरेन को जो सब उसने सुना और फिर भूल गया .

पर उस दिन के बाद जैसे कैसे भी, माँ रोज़ या हर दूसरे  दिन अपने उदास बेटे को  आश्रम ले जाने लगीं। इस उम्मीद में कि  उसका मन संभल जाएगा (आश्रम और साधू सन्यासियों के प्रवचन मन को बहलाने की चीज़ नहीं होते ) .  कुछ दिन और बीते और अब खुद वीरेन को भी वहाँ अच्छा लगने लगा .. प्रवचन होता था , वो सुनता था .. उसमे ज़िन्दगी की व्यर्थता, हमारे चारों और मोह माया के बंधन, हमारे  जीवन के वास्तविक लक्ष्य यानी मोक्ष प्राप्ति और इस जीवन में वास्तविक सुख कैसे पाएं और ऐसी जाने कितनी बातों का जिक्र रहता था .

वीरेन का थका हुआ मन था और उलझा हुआ दिमाग था .. ऋचा के जाने के बाद वैसे भी उसके लिए संसार सचमुच मोह माया जैसी ही कोई बेकार सी चीज़ बन गया था और आश्रम उसका नया शगल था .. यहाँ कुछ तो बात थी .. माहौल बेहद शांत रहता है, जैसे कोई अदृश्य सा aura  यहाँ की दीवारों, छत और हर छोटी बड़ी चीज़ को घेरे  हुए है।  सबसे शांत और रहस्यमय व्यक्तित्व था, स्वामी  अमृतानंद जी का।  जैसा उनका नाम था वैसा ही उनका aura था ..  धीमी  और गहरी  आवाज़ ... बस सुनता  ही जाए इंसान। स्वामीजी ने वीरेन की माँ को तसल्ली दी थी और अपने ही अंदाज़ में भविष्यवाणी भी  की थी, कि   उसका  बेटा  फिर से अपनी ज़िन्दगी में रम  जाएगा, उस बेकार सी लड़की की कोई परछाई भी उस पर बाकी नहीं रहेगी।  और इसलिए जब वीरेन ने अपनी शामें और कभी कभी दोपहर भी आश्रम में बिताने शुरू किये तो माँ को कोई ऐतराज नहीं हुआ।

"
अरे संतों की सेवा तो जितनी करो उतनी कम है ... इतने साल तो कभी गया नहीं .. अब जाकर कुछ सदबुद्धि आई है ". 

अब वीरेन को नहीं पता कि  उसे कौनसी सदबुद्धि  या और कोई बुद्धि मिल गई है पर वहाँ जाना उसे ज़रूर अच्छा लगता है . वहाँ से किताबें लाकर पढना , उनका अर्थ समझना और ये महसूस करना , यकीन करना कि  दुनिया में कोई तो है जिसे हम दिल खोल कर अपना हाल बता सकते हैं उसके आगे रो सकते हैं और उम्मीद भी कर सकते हैं हमारी प्रार्थनाओं और पुकार की कहीं तो सुनवाई होगी ही .. हो भी रही होगी .  (वैसे अब वीरेन की  प्रार्थनाएं ना तो करियर को लेकर थी ना और किसी सुख सुविधा के लिए, ऋचा का तो खैर अब सवाल ही नहीं उठता था)  अब उसकी प्रार्थनाये अपने लिए शान्ति और एक नए रास्ते की खोज के लिए हैं । वीरेन को विश्वास हो चला है कि  इस नश्वर संसार में अब और कुछ नहीं बचा जो देखा नहीं, जिसका अनुभव नहीं किया और  जिसकी कोई ख्वाहिश बाकी रह गई।

"
कहाँ  है आजकल,  कोई खबर ही नहीं तेरी ?"

"
बस यूँही .. "

"
अच्छा सुन आज चलते हैं,  वहीं ... तू पहुँच जाना। कहाँ रहता  है आजकल ?"

"
कहीं नहीं बस माँ  को आश्रम ले जाता हूँ तो वहीँ देर हो जाती है .."  एक सीधा सरल बहाना जो बेकार  गया .

"
क्या??? आश्रम ... तू कब से इन जगहों पर जाने लगा ..क्या चक्कर है भाई  ??"

अरे कुछ नहीं ...अच्छा मैं आ जाउंगा।"

लेकिन वीरेन कहीं नहीं गया , कभी नहीं गया।  उसे जाने में दिलचस्पी ही नहीं।  उसने कहीं जाना ही छोड़ दिया ... साथ ले जाने वालों के साथ कभी कभार जाता पर फिर जल्दी   लौट आता . वो ठिकाने, वो महफिलें, वो दोस्तों का मेला ..सब बेमजा और बेगाना होने लगा था ..जाने कैसा हो गया था वीरेन का मन, लगता था जैसे इंसानों  के इस जंगल में उसका कहीं कोई संगी साथी नहीं .. केमिस्ट्री, जियोग्राफी और मैथमेटिक्स अब सब अर्थहीन होने लगे थे ...  कोई कहता कि  वीरेन अब आधुनिक देवदास बनेगा, कोई कहता नहीं ये तो  नया ही अवतार लेगा .. कोई कोई हँसते कि  इसका दिमाग खराब हो गया है ... कुछ इलाज की ज़रूरत है।  कहने वाले दोस्त -यार सब ने  आखिर  तंग आकर कहना और पूछना और याद दिलाना भी छोड़ दिया . उन्होंने मान लिया कि  वीरेन को अब कुछ नहीं समझाया जा सकता।

पर वीरेन को अब कुछ नहीं बनना है .. बीते दिनों का एक छोटा सा टुकड़ा भी याद नहीं करना . बीती हुई कोई चीज़ वापिस नहीं चाहिए।  पर फिर भी उसे कुछ तो चाहिए, कुछ .. एक अपमान सा महसूस होता है उसे .. लगता है जैसे उसका अपना  एक हिस्सा छिन  गया  है।  बदला चाहिए उसे .. पर फिर सोचता कि  बदला किस से ले .. किस बात का .. और लेने या छीन सके ऐसा क्या शेष रहा।

आश्रम आकर एक अच्छी  चीज़ ये हुई कि  वीरेन के मन को यहाँ कुछ सुकून और  शांति मिलने लगी।  इस जगह आकर उसे लगता जैसे  दुनियादारी और  उसके नुमाइंदों की परछाई भी उससे दूर भाग गई है। उसे नफरत हो गई है रिश्तों से, शब्दों के जंजाल से, चेहरों के नकाब से और अंतहीन सामाजिक व्यवहारों के तरीकों से ... जिनमे आप लोगों को नापसंद करते हुए भी उनसे निभाते चले जाते हैं , सामने हंस हंस के बोलते हैं और मुंह फेरते ही बुराइयां गिनाने लग जाते हैं। जहां ज़रूरत के,  लालच के सम्बन्ध है।  जहां लोग अपने अलावा बाकी हर इंसान में, हर चीज़ में खामियां निकालते फिरते हैं। जिस चीज़ से शिकायत है उसी से चिपके हुए हैं।  जहां हर कोई अपनी ही सफलता, समृद्धि और उपलब्धि  के गीत गाये जा रहा है, दूसरों को उनकी कमतरी का अहसास दिलाये जा रहा है।  जहां हर तरफ घुटन है, हवा में सड़े  गले मांस की बदबू है ... और कई सारे पुराने कंकाल हैं .. जाने किन किन नामों का कफ़न ओढ़े हुए ... 

वीरेन को सांस लेना भी मुश्किल लगता है इस हवा में ... यहाँ रहना और जीना उसकी  बर्दाश्त से बाहर है।  पर जिम्मेदारियों और  दायित्वों  से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता  इसलिए इस बोझ को उठाये वीरेन भागता फिरता है दिनभर ...

और अब वीरेन कुछ तलाशने में जुट गया है, उसे ऐसा लगता है जैसे वो इस आस पास के माहौल से belong नहीं करता .. उसे कहीं और होना चाहिए .. ये हर रोज़ का गल्ले का हिसाब, ये खरीद - बेचान के समीकरण, ये मुनाफे और घाटे का हिसाब ...इनमे अब उसका मन नहीं टिकता . 
उसकी प्यास नहीं मिटती .. उसकी तृष्णा  शांत नहीं होती .. सवाल के बिच्छू डंक मारते ही रहते हैं। सब से दूर कहीं खो जाने, किसी  अनजानी मगर उजली मिटटी में मिल जाने का उसका मन चाहता है।

वीरेन अपने इन सब सवालों को स्वामी अमृतानंद  के सामने रख देता  .. और हैरानी की बात ये भी थी कि  आजकल अब वो बहुत दार्शनिक  नज़रिए से सोचने और सवाल करने लगा था।

"
ऐसा क्यों होता है ... वैसा क्यों नहीं होता ? और अगर ऐसा ही होना है तो फिर हम क्या सिर्फ  मूक दर्शक है अपने ही जीवन की घटनाओं के ?"

"
और इस जीवन के परे इस संसार के परे सच में कोई स्वर्ग है क्या ? ये मोक्ष क्या है ..और अभी जो नरक इस जीवन में झेल रहे हैं वो मरने के बाद के नरक के अतिरिक्त यानी एक्स्ट्रा addition है क्या ?"

उसका सबसे बड़ा सवाल था कि  इस आम साधारण ज़िन्दगी को  असाधारण  कैसे बनाया जाए ???? स्वामी अमृतानानद  सुनते .. मुस्कुराते .. अपनी आँखों को थोडा सा बंद करते फिर अपने नज़रिए और ज्ञान के मुताबिक़ जवाब देते।  कई बार वीरेन के सवाल शांत हो जाते कई बार नहीं भी होते।

अपने  काबिल बेटे के बदले रंग ढंग और उसका नई  चाल ढाल घरवालों की खासतौर पर पिता का सरदर्द बन रही है और माँ ये सोचती कि  कोई नहीं सब ठीक हो जाएगा ... वीरेन की शादी हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा ..पर लड़का माने जब ना।  अब उसे शादी नहीं करनी अपना परिवार, गृहस्थी, बीवी  ये सब शब्द वीरेन को बेहद दकियानूस और बोझ लगते हैं ... (जिसके साथ सात साल गुज़ारे जब वही ज़िन्दगी में साथ निभाने को राज़ी ना हुई तो ये मम्मी और डैड की ढूंढी हुई राजरानी कौनसा साथ निभाएगी ) 

और फिर इसी मुद्दे पर घर में बहसें चलती ... लम्बी लम्बी .. जिनका कोई निष्कर्ष नहीं था .. वीरेन शादी नहीं करेगा और ऐसे ही सवालों के जवाब ढूंढता फिरेगा ... माँ और बूढ़े पिता के माथे पे मारे चिंता के पड़ने वाली रेखाएं और गहरी होती जातीं ... ज़िन्दगी  अपने इन चेहरों से बेहाल हो उठी थी।

कुछ हफ्ते, महीने बीते ... वीरेन को इतना तो समझ आ ही गया कि  ऋचा वाला अध्याय ना उसकी कोई व्यक्तिगत असफलता है, ना उसका अपमान और ना ही उसकी कोई गलती ... बीती ज़िन्दगी को जब सोचता, बैंगलोर, मुंबई और पूना में गुज़रे सालों को याद करता।। वो सच में ज़िन्दगी का एक बेहद खुशगवार वक़्त था .. बेफिक्री थी .. भविष्य के सपने थे ..वीरेन तो अब भी वही है   पर अब उसे लगता कि  अपनी ज़िन्दगी को ऐसे किसी आयाम पर ले जाए जहां  ये  सो-कॉल्ड  असफलताएं , ये निराशाएं और वो पूरी ना हुई ख्वाहिशें अपने आप में ही छोटी पड़  जाएँ।  कुछ ऐसा जो उसे इस दकियानूसी माहौल से दूर ले जाए। अब उसे ना स्टेटस चाहिए था, ना पैसा, ना कोई और चीज़ अब उसकी आँखों को आकर्षित कर पा रही है ... पैसा और उस से खरीदी जाने वाली ख़ुशी अब ख़ुशी नहीं लगती  थी .. स्टेटस तो पहले भी था  और अभी भी है पर  उसे बना संवार के रखने की कोशिशें सिवाय बोझ के और कुछ नहीं ...

लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं निकाल  सकते हम कि  वीरेन को इस संसार से, इस  तथाकथित नश्वर संसार से कोई वितृष्णा हो गई थी या उसने  वैराग्य  लेने का इरादा कर लिया था।  अगर कोई गौर से देखता तो समझ पाता  कि  वेरेन दरअसल अपने ही तरीके से उस भूतकाल से छुटकारा पाने की कोशिश में लगा था .यानी उसके हिसाब से ज़िन्दगी वापिस नार्मल ट्रैक पर आ रही थी। 

पर अभी सब कुछ  नार्मल कहाँ हुआ है .. जब हम सोचते हैं कि  अब  सब  ठीक है तभी ज़िन्दगी अपने तरीके से कोई यू  टर्न लेती है। एक अच्छी खासी शाम को, एक लम्बे वक़्त के बाद दोस्तों के साथ एक पूरी शाम और शायद रात भी गुज़ार देने का इरादा बनता, पर घर से कोई ज़रूरी  काम के लिए फोन  आया और वीरेन रवाना हुआ . मस्ती से, आराम से  अपनी बाइक  चलाते हुए .. रास्ते से कुछ सामान  लेना था , इसलिए वीरेन रुका शहर के सबसे व्यस्त चौराहे के सामने वाले बाज़ार की किसी दूकान पर। दूकान पर भीड़ थी, उसका नंबर आने और सामान मिलने में अभी वक़्त लगना था .. इसलिए उसकी आँखें यूँही  "बाज़ार दर्शन" करने लगी .. और निगाहें रुकी चौराहे पर बने सर्किल के किनारों पर बैठे एक परिवार पर .. उसमे बच्चे थे, बड़े भी थे और वो भिखारी ही थे। पर वीरेन ने कुछ और भी देखा ... उसने हँसते हुए बच्चे  देखे, अपने से छोटों को हाथ से कुछ  खिलाते हुए , बड़े प्यार से आपस में बतियाते हुए परिवार के लोग देखे, एक दुसरे से हंसी मजाक करते हुए, किसी नन्हे को गोद में खिलाते हुए एक काले गंदे से भिखारी को भी देखा। ऐसा लग रहा था कि  उन लोगों को  इस वक़्त इस पूरे जहान  में किसी से कोई लेना देना नहीं .. ये जो शाम का भागता दौड़ता ट्रैफिक है, ये बाजारों की व्यस्तताएं,  ये भीड़ का शोर .. किसी बात से कोई मतलब नहीं उनको।  चौराहे पर बसी अपनी ही उस टेम्पररी दुनिया में खुश थे।

ये नज़ारा जैसे वीरेन के दिल पर नक्श हो गया। वो घर लौटा और एक बार फिर  से  "खो" गया ... उसी चौराहे पर, उन भिखारियों की हंसी में।                                                                                                                                                      (शेष अगली बार)
                                                                                                                                                                          भावना लालवानी
Sunday, 29 March 2015
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं एक तो वे जो भीड़ में चलते हैं यानी कि उनमें ऐसा कुछ खास नहीं होता कि हम उन्हें याद करें या उनके बारे मे बात करें लेकिन साथ ही ये भी है कि कुछ लोग बातें तो करते ही हैं चाहे बात करने लायक हो या नहीं उन्हें तो सिर्फ बात करने या कहना चाहिए कि बात बनाने से मतलब है ये तो हुए यक तरह के लोग पर दूसरी तरह के लोग कुछ अलग होते हैं उनका समूह नहीं होता वे तो सिर्फ खास व्यक्ति होते हैं और कुछ खास होने के नाम पर आप ऐसा बिल्कुल न समझें कि उनकी शारीरिक रचना सामान्य लोगों से कुछ अलग होती है हाँ लेकिन मानसिक संरचना ज़रूर थोड़ी अलग होती है तभी तो वे कुछ ऐसा करते हैं कि भीड़ से अलग माने जाते हैं।
समाज के पुराने ढर्रे पर चलना जैसे उनके व्यक्तित्व के खिलाफ हो। वे तो हमेशा कुछ अलग करने की फिराक़ में ही रहते हैं और यही फितूर भीड़ से अलग कर देता है। कभी-कभी तो इतना अलग किम वे एक इतिहास बन जाते हैं और कभी वर्तमान का अति विकसित हिस्सा। ऐसा सोचने और करने वालों में ज्यादातर युवा हैं जो अजीब और अटपटे लगकर खुद को भीड़ से अलग दिखाने की चेष्टा में तल्लीन रहते है और वे अलग नहीं बल्कि विचित्र नज़र आते हैं और सामान्य लोग उन्हें मानसिक विक्षिप्तता का शिकार मानने लगते हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि जो लोग अलग दिखने की चाह में अलग कार्यों को अंजाम देते हैं वे इस श्रेणी में आते हैं। पर कुछ लोग तो स्वभावतः ही अलग होते हैं , उन्हें इसके लिए किसी शारीरिक श्रम और तकनीक की आवश्यकता नहीं होती। बस वह तो अपनेआप ही हो जाता है। कभी-कभी ऐसे लोग सामाजिक बदलाव लाने वाले नींव के पत्थर साबित होते हैं। और ऐसे लोगों को कुछ लोग अपना आदर्श बनाकर उन्हें फोलो करने लगते हैं।
आज जब से मैं निशा से मिली हूँ न जाने क्यों ये सब सोचने पर मजबूर हो गयी। निशा मेरे बचपन की सहेली है कई सालोइ बाद आज बाज़ार में उससे मिली तो खुशी का ठिकाना न रहा लेकिन वह उतनी खुश नहीं लग रही थी। मैंने कारण पूछा तो वह उस समय टाल गई लेकिन मैं उसे लेकर पास के कॉफ़ी शॉप में गयी। जहाँ हमने ढेर सारी बातें की और जो बातें वह टाल रही थी वहाँ उसने अपना दिल खोल कर रख दिया उसने जो बताया उस पर यक़ीन करना बहुत मुश्किल था उस वक़्त के लिए। लेकिन अभी जब मैं उसके बारे में सोच रही हूँ तो लग रहा है कि इसमें कुछ भी तो नया नहीं है अक्सर ऐसा ही तो होता है।
कॉलेज में या कहें कि स्कूल से ही निशा और राहुल साथ-साथ थे लेकिन बचपन का यह साथ दोस्ती की पकड़ से छूट कर प्यार में बदल गया उसका एहसास निशा और राहुल को बाद में हुआ लेकिन पूरा कॉलेज तो कब का यह जान चुका था। और मैं भी जब कभी उन्हें इस बात का एहसास दिलाने की कोशिश करती तो वे इसे मज़ाक समझते। लेकिन एक दिन निशा की शादी की बात उसके परिवार में हुई और लड़के वाले देखने आये तो निशा मेरे पास आई और बोली “मैं राहुल से प्यार करती हूँ और उसके बिना किसी और के साथ ज़िन्दगी बिताना मेरे लिए पॉसिबल नहीं है।” अचानक हुई इस बात से मैं भी चौंक गई ख़ैर मैंने सहेली होने का फ़र्ज़ निभाते हुए राहुल को फोन करके बुलाया और तब उस दिन दोनों ने स्वीकार किया कि वे एक –दूजे के लिए बने हैं और कभी अलग नहीं होंगे। और उसके बाद तो उनका प्यार बढ़ता ही गया।
ये सब कुछ एक फिल्म जैसा था मेरे लिए लेकिन यह एक हकीकत थी और चूँकि दोनों अलग-अलग जाति के थे दोनों के माता-पिता शादी के लिए तैयार नहीं थे लेकिन आज के गरम खून के बहाव को रोकना पुरानी पीढ़ी के बस की बात नहीं थी और उन दोनों ने कोर्ट में जाकर शादी कर ली और उसकी साक्षी बनी मैं। मेरी माँ ने मुझे इसके लिए बहुत डाँटा लेकिन मुझ पर कोई असर न था आख़िर मैं भी तो नई पीढ़ी का ही एक हिस्सा थी। मैं बहुत खुश थी कि मेरी वजह सेस मेरे दोस्तों का जीवन पूर्ण हुआ।
शादी के तुरंत बाद वे दोनों शहर छोड़कर चले गए,  ये सोचकर कि अपने नये जीवन की शुरुआतवे एक नये शहर से करेंगे और पिछले पाँच सालों से मेरा कोई संपर्क नहीं रहा उनसे। पाँच सालों बाद आज हम मिले। आज उसे देखते ही मुझे लगा कि ये अब वह पुरानी चहकती निशा नहीं रही। हमेशा खुश रहने वाली मेरी सहेली बहुत गंभीर और ज़िंदगी से निराश जान पड़ती है। कारण था कि शादी के बाद जैसे-जैसे परिवार बना और ज़िम्मेदारियाँ बढ़ने लगी प्यार न जाने कहाँ काफ़ूर हो गया। उसकी एक बेटी भी है जो अभी चार साल की है। उसने बताया कि राहुल और उसके बीच वह प्यार नहीं रहा जो कभी हुआ करता था। अब तो वे बात-बात पर झुँझलाते हैं और लड़ते भी हैं। दोनों ही पढ़े-लिखे हैं, स्वावलंबी हैं और स्वतंत्रता भी चाहते हैं। लेकिन पुरुष प्रधान समाज में नारी की स्वतंत्रता कहाँ संभव है?  शादी होते ही, पति बनते ही न जाने क्या हो जाता है कि वह सम्पूर्ण स्त्री पर अपना अधिकार जताने लगता है और उसे भी अपनी सम्पत्ति समझने लगता है। वह प्यार जो दोस्ती और बराबरी से शुरु हुआ था शादी के बाद अधिकार में बदल गया। यह बदलाव अरेंज मैरिज में  ही नहीं होता बल्कि प्रेम विवाह में भी ऐसा ही होता है। मैंने देखा हे मेरे माँ-पिताजी और उनके जैसे न जाने कितने ही दम्पत्ति पति-पत्नी तो हैं, जीवन-साथी तो हैं लेकिन सिर्फ़ नाम के। उनका जीवन मुझे समझौते और जिम्मेदारी के सिवा कुछ नहीं लगता।
आज जब मैं खुद को देखती हूँ , खुद के बारे में सोचती हूँ तो खुश होती हूँ  अपने फैसले पर  हालाँकि इसके लिए मुझे बहुत लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी और आज तक भी लड़ रही हूँ क्योंकि भारतीय समाज में शादी न करने का फैसला वह भी एक लड़की का आसान नहीं है। और उससे भी मुश्किल तो ये बात कि अपने किसी दोस्त के साथ बिना शादी किए रहना लेकिन पिछले तीन सालों से मुझे या मनीष को कभी एक पल के लिए भी यह अफ़सोस नहीं हुआ कि हमने ग़लती की है या कर रहे हैं हम दोनों अलग होके भी एक हैं और एक होकर भी अलग। हम दोनों के बीच कोई समझौता नहीं है बल्कि आपसी समझ है हम ने मिलकर एक घर बनाया है मकान नहीं। मैंने एक अनाथ बच्ची को गोद भी लिया है और यह मेरा फैसला था इसलिए मैं ही उसकी ज़िम्मेदारी भी उठाती हूँ। मनीष इसके लिए बाध्य नहीं है। अगर वह उसके लिए कुछ करना चाहता है तो कर सकता है। मनीष का मुझ पर अधिकार नहीं है बल्कि प्यार है जिसका एहसास वह समय समय पर करवाता रहता है। हमारे संबंध सिर्फ़ मन तक नहीं है बल्कि यह प्यार मन ही से तन तक भी पहुँचता है और यह स्वाभाविक है कि प्रेम हालाँकि एकअनुभूति है जिसे सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है लेकिन इसका इज़हार भी ज़रूरी है और इसमें कभी-कभी मन के साथ तन का मिलना भी ज़रूरी है। और मुझे और मनीष को इसमें तनिक भी असहजता या असाधारणता नज़र नहीं आती। लेकिन  हमारे परिवारों को ये स्वीकार्य नहीं है और सिर्फ  परिवार ही नहीं बल्कि हमारे भारतीय समाज को भी इसमें शर्म आती है आख़िर क्यों ? क्योंकि इसमें स्त्री पर अंकुश नहीं है या कि फिर अपनी अर्धांगिनी बनाने के बहाने उसके स्व को छिन्न-भिन्न करना जिसमें वह अपनी मर्ज़ी से सोचने तक का अधिकार नहीं पाती है ।

बहुत सवाल हैं मेरे पास शायद इन्हीं सवालों के जवाब ढ़ूँढने की कोशिश में हूँ और इस समाज के विपरीत दिशा में सोचने ही नहीं बल्कि चलने के कारण मैं साधारण सी लड़की होके भी भीड़ से अलग हूँ और मुझे इसका गर्व है।
रश्मि शर्मा

Monday, 16 March 2015
नानी बाई रो मायरोगुजरात और राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोक-आख्यान हैबीती तीन-चार सदियों में नरसी जी
 के जीवन के इस प्रसगं ने नरसी से अलग अपना एक स्वतंत्र चरित्र, एक स्वायत्त स्वरूप ग्रहण कर लियाइस आख्यान को बार-बार रचने और तरह-तरह से कहने और गाने वालों में से बहुतों को पता भी नहीं है कि नरसिहं महेता भक्तिकालीन साहित्य के प्रसिद्ध कवि भी थे और उन्होंने वैष्णव जन तो तेहेने कहिए, जे पीड  परायी जाणे रे‐’ जैसे प्रसिद्ध पद की रचना की थीआगे चलकर जिसे गुजरात के ही एक और महात्मामहात्मा गाँधी ने अपनी प्रार्थना सभाओं में गाया थालोक मे नरसी जी का भातगाने वालों को इस बात से प्रायः लेना-देना नहीं है कि नरसी कवि थे या  नही थे उन्हे  तो लनेा-देना है नरसी नाम के उस गरीब पिता से जिसके पास अपनी बेटी की बेटी के विवाह में भात के चार कपड़े ले जाने लायक पूंजी भी नहीं थी और इस कारण उसे घोर तिरस्कार झेलना पडा़ थाइधर गांव मे अपने भाई-बंधुओं द्वारा उपहास उड़ाया जाना और उधर समधी पक्ष द्वारा अपमानजनक टिप्पणिया  करते हुए उपहास उड़ाया जाना, लोक के कवि नरसी जी के जीवन की इस विडम्बना को अपने जीवन के बहुत करीब पाते हैयही वजह है कि वे नरसी जी के भातके माध्यम से उस प्रताडऩा को बार-बार रचते हैं. जो उन्हें गरीबी के कारण पग-पग पर झेलनी पड़ती हैउस अपमान को कहते हैं जो उन्हें अपने श्रमषील और मानवीय जीवन के बावजदू केवल इसलिए झेलना पड़ता है कि उनके पास जमा-पूजी कुछ भी नहीं हैइस आख्यान की लेाक प्रियता का दूसरा कारण बेटियों से जुडा़ पहलू है बेटियों को सुसराल में पीहर की गरीबी को लेकर जो ताने सुनने पडत़े है बात-बात में जो दबकर चलना, दबकर रहना पड़ता है, इतना दबकर कि वहा  उनका अस्तित्व ही हंसी का पात्र हेा के रह जाता हैउनके व्यक्तित्व में किस कदर हीनता आ जाती है इसका अनुमान इस लोक-आख्यान में आने वाले इस प्रसगं से लगाया जा सकता है कि जब नरसी अपने निर्धन सधियो के साथ भात के लिए पहुचंते है तो उनकी बेटी उनसे कहती है-आप यहाँ क्यों आए,  आपकी इस दषा में आना  तो मेरा और अपमान होगाभात या मामेरा-एक रष्म है जिसमें बेटी की संतानों के विवाह के अवसर पर उसके पीहर वाले ससुराल पक्ष के लिए वस्त्र लेकर जाते है। आर्थिक रूप से टूटे हुए परिवारों के लिए यह दहेज की तरह ही एक और विकराल समस्या है। भात में कितना और क्या दिया, इससे समाज में परिवार की प्रतिष्ठा बनती-बिगड़ती है। राज्य की आर्थिक नीतियों के चलते आम-जनता का जीना वैसे ही मुहाल हुआ रहता है, ऐसे में एकाएक आ धमकने वाले इस खर्चे से अनके परिवार और परेशानी में आ जाते है।  बेटी  के सुसराल पक्ष की मोटी मागं  और पीहर पक्ष द्वारा उसे कैसे भी करके पूरी न कर पाना इधर घर-घर की कहानी है। नरसी जी के भातकी लोकप्रियता की यह भी एक वजह है। पूर्वी राजस्थान में नरसी जी के भात के इतने लोकगीत हैं कि उनकी कोई  एक स्क्रिप्ट तय करना संभव नहीं है। कोई एक स्क्रिप्ट आप चुन तो सकते हैं लेकिन यह इतनी ही है और ऐसी ही है यह कहना संभव 
नहीं है। किसी और गांव में कोई  अलग रूप उसका मिल जाएगा। लोकगीत की किसी और शैली में लेकिन प्रसंग:नरसी  के भातका ही होगा, वर्णन वही होगा लेकिन कहने का ढंग , संगीत, धुन, लय, बोल सब कुछ बदल जाएगा। इसी अनोखेपन के चलते कहने का समय और स्थान भी बदल जाते है। इससे जुड़ी हुई एक और दिलचस्प बात यह है कि लोक गीत की शैली कन्हैया, ढांचा या पद जो भी हो सभी में एक समानता देखने को मिलती है कि किसी में भी गरीबी का रोना नहीं रोया गया है और गरीबी के चलते होने  वाले हृदय-विदारक तिरस्कार को जितने मार्मिक ढगं से कहा गया है, उतने ही कड़े बोलों से धन के मिथ्या-अभिमान को एक पल में ध्वस्त करके रख दिया हैऔर इस तरह गरीबी-अमीरी को महज परिस्थिति जन्य चीज वस्तु मानकर मानवीय-जीवन के होने भर की उदारता व महता को स्थापित किया है                                      प्रभात


 

 
Saturday, 24 January 2015
पाकिस्तानी सिपाही – चांदनी चौक में घर की छत पर चाँद ऐसे निकलता था जैसे मेरी घाट पर ही गिर पड़े....ओये, लाहौर के चाँद ने तो मुंह ही नहीं लगाया कभी.
हिन्दुस्तानी सिपाही – अपने-अपने चाँद बदल ले, ओये!”

हिन्दू – साब, लक्ष्मण के अकेले की बात कहाँ रही....वो किशन तो हम सबका भाई था....हम सब हिन्दुओं का भाई....उसकी बॉडी हमें ही मिलनी चाहिए....अगर तुम इन मुसलमानों को खुश करने के लिए निर्णय ले रहे हो....तो एक बात याद रखना....तुम पुलिसवाले और मुसलमान पछतायेंगे, बहुत पछतायेंगे.
मुसलमान – साब, अगर हमारी बॉडी हमें ना मिली ना....तो याद रखना....इन सबको कब्र में दफना देंगे....यह सब आ जायेंगे कब्रिस्तान में....बहुत बड़ा कब्रिस्तान है हमारा....फैमस है.”

 कितना अजीब संयोग है, दोनों ही संवादों में एक हिन्दू है तो दूसरा मुसलमान, फर्क बस एक लकीर का है, जिनके बीच लकीर है वो उसे मिटाकर भाईचारा-सोहार्द बढ़ाने की कोशिश कर रहे है और जिनके बीच किसी भी तरह की कोई लकीर नहीं वो नफरत की लकीर खींचने को बढ़ावा दे रहे है. पहला संवाद ‘विजयराज’ अभिनीत-निर्देशित फिल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ का है, तो दूसरा संवाद ‘गाँधी माय फादर’ के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके निर्देशक ‘फिरोज अब्बास खान’ की फिल्म ‘देख तमाशा देख’ का.  दोनों ही फिल्में एक-दुसरे के बिल्कुल विपरीत है. “क्या दिल्ली क्या लाहौर” बंटवारे के करीब एक साल के बाद के हालात पर है, सरहद पर अपने-अपने देश के लिए लड़ते दो ऐसे सिपाहियों की कहानी है जो बदले हालत में भूख-प्यास से लड़ते बंदूक की भाषा-गोलियों की भाषा भूलकर प्यार की भाषा सीख जाते है. वहीँ “देख तमाशा देख” एक राजनेता के विशाल कटआउट के नीचे दबकर मर गए एक गरीब आदमी की धार्मिक पहचान ढूंढने के चक्कर में भारत के राजनैतिक-सामाजिक चरित्र को उजागर करती है.
  ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ गुलजार की पंक्तियों में सरहद की लकीर को स्वीकार करते हुए कबड्डी खेलने का आह्वान करते हुए विभाजन के बावजूद भाईचारे पर जोर देती है, तो ‘देख तमाशा देख’ एक मृत व्यक्ति को सिर्फ जलाने या दफनाने की एवज में एक कफ़न के वास्ते दो कौमों के टकराव के साथ सरहद के भीतर विभाजन को दर्शाती है. जब देश के भीतर ही भाईचारा नहीं है, तो पडौसी मुल्क से भाईचारे की उम्मीद तो बेवकूफी ही होंगी. सीमा पर वो दोनों सिपाही अपने-अपने चाँद को exchange करने की बात कर रहे है, लेकिन सीमा के भीतर तो हम एक-दुसरे को expire करने में लगे हुए है.

हिन्दुस्तानी सिपाही – टाइम बता फिर?
पाकिस्तानी सिपाही – साढ़े छ:.
हिन्दुस्तानी सिपाही – ओये, हमारी घडी में तो बादशाहों सात बजे है...घडी तो आपकी ख़राब हो गई.
पाकिस्तानी सिपाही – हाँ, तुम लोग तो वैसे भी आधे घंटे आगे हो ना हमसे.
हिन्दुस्तानी सिपाही – चलो...शुकर है रब का...माने तो सही...पुतरजी...कि कहीं ना कहीं हम आपसे आगे है और आप हमसे पीछे...हैं ना...हहाहाहा.”
     
        यहाँ जो हंसी है वो किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं है, एक तरह का उपहास है, एक तरह का ताना है उन लोगो के खिलाफ़ जिन्होंने ऐसे बादशाहों का समर्थन किया जो गद्दी के खातिर ऐसी सरहद बना डाली जिससे आधे घंटे का फासला पड़ गया और अब वे ही लोग लाहौर में बैठे चांदनी चौक में कोरमे की खुशबु याद कर रहे है या चांदनी चौक में बैठे लाहौर की लस्सी याद कर रहे है. लेकिन जहाँ घडी की सुइयां सब जगह एक-सी चल रही है, एक ही वक्त दिखा रही है, वहां भी हम ऐसे ही बादशाहों का समर्थन कर रहे है जो वोट के खातिर हमारे बीच नफरत पैदा कर रहे है, हमें प्रोत्साहित कर रहे है की हम एक-दुसरे को पीछे धकेले और ऐसा करते अपना-अपना बाहुल्य स्थापित करने के चक्कर में, हम न जाने कितने अनगिनत घंटो का फासला पैदा कर चुके है.

शब्बो – गाँव में दो पार्टियों का झगडा चल रहा है.
प्रशांत – दूसरी पार्टी मतलब?
शब्बो – तुम लोगों की पार्टी.
प्रशांत – मैं कब से दूसरी पार्टी का बन गया?
शब्बो – तो फिर तू कौनसी पार्टी का है?
प्रशांत – शब्बो, मैं इस पार्टी का भी नहीं और उस पार्टी का भी नहीं, मेरी अपनी तीसरी पार्टी है.
शब्बो – तीसरी पार्टी!
प्रशांत – प्यार करने वालो की पार्टी...हम लड़ते-झगड़ते है...लेकिन प्यार से...हम करीब आने के लिए झगड़ते है...दूर जाने के लिए नहीं.”
         
         एक इतिहास का बुजुर्ग लेखक व विचारक प्रोफ़ेसर शास्त्री(सतीश आलेकर) जिन्होंने अपनी किताब में उस गाँव के जहरीले इतिहास को प्रस्तुत किया, तो उस किताब को पढ़े बगैर असामाजिक तत्वों ने उसकी सभी प्रतियों को जला दिया. एक मुस्लिम युवा लेखक जो मुसलमानों को भड़काऊ भाषण देते मौलाना(सुधीर पांडे) के खिलाफ फ़तवा जारी करता है, उसके घर को उसकी ही कौम के लोगो द्वारा जला दिया जाता है. समुन्द्र किनारे पाल पर बैठे यह दो प्रेमी प्रशांत-शब्बो जो सिर्फ एक-दुसरे से प्यार के सिवा किसी मजहब का फर्क नहीं समझते, घर से भागते वक्त प्रशांत(आलोक राजवाड़े) को मुसलमान गोली मार देते है.
         एक बेचारा गरीब किशन जो मुस्लिम औरत फातिमा(तन्वी आज़मी) का तांगा चलाते-चलाते उसे अपना दिल दे बैठता है और उससे शादी के खातिर अपना धर्म बदलकर हामिद बन जाता है और एक फातिमा, जो गाँव के बदले हालात-बवाल के लिए हर वक्त खुद को जिम्मेदार ठहराती है कि उसने किशन से शादी की ही क्यूँ?, या उसे हामिद के साथ गाँव छोड़कर चले जाना था. प्रशांत की हत्या के बाद शब्बो(अपूर्वा अरोरा) अपनी माँ फातिमा से जब पूछती है कि ‘आप मेरी और प्रशांत की शादी करवाती ना’, तो वो इंकार कर देती है. लेकिन शब्बो का अगला सवाल ‘अगर मैं भाग जाती तो’, फातिमा का जवाब था ‘मैं तुझे नहीं रोकती’. जिन सांप्रदायिक दंगो के दोषी होने का दर्द वो भोग रही है, वैसा ही दर्द वो अपनी बेटी शब्बो के हिस्से नहीं आने देना चाहती है. वो कभी नहीं चाहती कि प्रशांत इस गाँव के लिए दूसरा हामिद बने. यह सब लोग तीसरी पार्टी के लोग है जो किस मजहब से ताल्लुक रखते है कि फिकर किये बिना, अपने आप को इंसानियत के धर्म के बाशिंदे समझते है.
             आदमी ने आग खोजी. चक्का बनाया और खेती शुरू कर दी. खेतों की देखभाल के लिए उनके बीच झोंपड़ी बना ली. कुंए खोद लिए और बस्तियां बस गईं. सबकुछ सही चल रहा था तो फिर बवाल कब शुरू हुआ? जिस दिन एक आदमी ने एक डंडी उठाकर जमीन पर एक घेरा बनाया और कहा जमीन का यह टुकड़ा मेरा है और यह टुकड़ा तेरा है. टुकड़े घटते-बढ़ते गए, लेकिन फसाद लगातार बढ़ते गए. सल्तनत बनीं, मुल्क बने. इंसान हर वक्त इसी गलतफ़हमी में रहा कि अगर खुद को बाहुबली बनाना है तो अपना खुद का एक टुकड़ा होना चाहिए और इन टुकड़ो की ग़लतफहमी में इंसान धीरे-धीरे बिगड़ता चला गया, इतना बिगड़ गया कि एक दिन भूल ही गया कि वो जिन टुकड़ो के भीतर टुकड़े कर रहा है उन्हें कभी जमीन पर डंडी के घेरे की जरुरत ही ना पड़ी.
          ‘रन’, ‘देहली बेली’, ‘डेढ़ इश्कियां’ में अपने अभिनय का लोहा मनवा कर निर्दशक की ओर रुख करने वाले अभिनेता विजय राज का कहना है कि “गुलजार साहब उनके निर्देशन में बनी फिल्म क्या दिल्ली क्या लाहौरके गीत लिखने व उसके निर्माता बनने के लिए तैयार हो गए थे लेकिन यह निर्णय उन्होंने फिल्म देखने के बाद ही किया. गुलजार साहब ने उनसे कहा था कि पहले फिल्म बनाओ फिर हम देखेंगे. जब उन्हें यह फिल्म दिखाई गई तो उन्होंने इसे बहुत पसंद किया और वे इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए राजी हो गए”.
         पाकिस्तानी सिपाही रहमत का किरदार खुद विजय राज ने निभाया है, वहीँ हिन्दुस्तानी सिपाही(बावर्ची) समर्थ के किरदार में मनु ऋषि चड्ढा ने सबके चौंकाया है. इसके अलावा राज जुत्शी और विश्वजीत प्रधान भी छोटे रोल में मुकम्मल असर छोड़ते हैं. यह फिल्म बोस्निया हर्जेगोविना की फिल्म ‘नो मैंस लैंड’ की कहानी से काफी मिलती-जुलती है जिसने ऑस्कर में लगान को हराया था. वहां भी दो अलग पालों में खड़े सिपाही मानवीय त्रासदी का आख्यान अपनी कहानियों और संवादों के जरिए सुनाते हैं. यहां भी कुछ ऐसा ही है.
          ‘तुम्हारी अमृता’, ‘सालगिरह’, ‘महात्मा वर्सेस गांधी’, ‘सेल्समेन रामलाल’ जैसे नाटकों का सफल मंचन कर ‘गाँधी माय फादर’ फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके निर्देशक फिरोज अब्बास खान के मुताबिक़ “इस फिल्म में दिखायी गयी घटनाएं सच्ची हैं. कई साल पहले मुझे एक अवकाशप्राप्त पुलिस आयुक्त ने कहानी सुनाई थी, जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था. जब मैं अपनी पहली फिल्म बना रहा था तब भी मुझे यह कहानी फिल्म बनाने के लिए प्रेरित करती थी. अब जाकर मैं इसे बना पाया हूँ और जब तक इस फिल्म का निर्माण नहीं हो जाता उनकी अंतरात्मा पर बोझ बना रहता”.
          फिल्म में सतीश कौशिक ने अवसरवादी राजनेता की भूमिका निभाई है जो स्थानीय अख़बार के मालिक भी है. वहीँ हिंदू नेता बांडेकर के रोल में शरद पोंक्शे व मुस्लिम नेता सत्तार भाई के रोल में जयवंत वाडेकर का अभिनय प्रशंसनीय है जो अंत में पूरा मामला निपट जाने के बाद नाव में एक-दुसरे से हाथ मिलाते हुए हँसते हुए दिखाई पड़ते है. विनय जैन पुलिस अधिकारी विश्वासराव के रूप में, पुलिस इंस्पेक्टर सावंत के रूप में गणेश यादव का अभिनय सहज महसूस होता है.

और अंत में गुलजार की पंक्तियाँ....

“लकीरें है, तो रहने दो....
किसी ने रूठ कर....
गुस्से में शायद, खींच दी थी....
इन्ही को बनाओ अब पाला...
और आओ, कबड्डी खेलते है....
मेरे पाले में तुम आओ, मुझे ललकारो....
मेरे हाथ पर तुम हाथ मारो, और भागो....
तुम्हे पकडू, लिपटू....
और तुम्हे वापस ना जाने दूं....
लकीरें है, तो रहने दो....
किसी ने रूठ कर....

गुस्से में शायद, खींच दी थी....”         - तनुज व्यास