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जोधपुर में कला व संस्कृति को नया आयाम देने के लिए एक मासिक हिंदी पत्रिका की शरुआत, जो युवाओं को साथ लेकर कुछ नया रचने के प्रयास में एक छोटा कदम होगा. हम सभी दोस्तों का ये छोटा-सा प्रयास, आप सब लोगों से मिलकर ही पूरा होगा. क्योंकि कला जन का माध्यम हैं ना कि किसी व्यक्ति विशेष का कोई अंश. अधिक जानकारी के लिए हमें मेल से भी संपर्क किया जा सकता है. aanakmagazine@gmail.com

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Sunday, 29 March 2015
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं एक तो वे जो भीड़ में चलते हैं यानी कि उनमें ऐसा कुछ खास नहीं होता कि हम उन्हें याद करें या उनके बारे मे बात करें लेकिन साथ ही ये भी है कि कुछ लोग बातें तो करते ही हैं चाहे बात करने लायक हो या नहीं उन्हें तो सिर्फ बात करने या कहना चाहिए कि बात बनाने से मतलब है ये तो हुए यक तरह के लोग पर दूसरी तरह के लोग कुछ अलग होते हैं उनका समूह नहीं होता वे तो सिर्फ खास व्यक्ति होते हैं और कुछ खास होने के नाम पर आप ऐसा बिल्कुल न समझें कि उनकी शारीरिक रचना सामान्य लोगों से कुछ अलग होती है हाँ लेकिन मानसिक संरचना ज़रूर थोड़ी अलग होती है तभी तो वे कुछ ऐसा करते हैं कि भीड़ से अलग माने जाते हैं।
समाज के पुराने ढर्रे पर चलना जैसे उनके व्यक्तित्व के खिलाफ हो। वे तो हमेशा कुछ अलग करने की फिराक़ में ही रहते हैं और यही फितूर भीड़ से अलग कर देता है। कभी-कभी तो इतना अलग किम वे एक इतिहास बन जाते हैं और कभी वर्तमान का अति विकसित हिस्सा। ऐसा सोचने और करने वालों में ज्यादातर युवा हैं जो अजीब और अटपटे लगकर खुद को भीड़ से अलग दिखाने की चेष्टा में तल्लीन रहते है और वे अलग नहीं बल्कि विचित्र नज़र आते हैं और सामान्य लोग उन्हें मानसिक विक्षिप्तता का शिकार मानने लगते हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि जो लोग अलग दिखने की चाह में अलग कार्यों को अंजाम देते हैं वे इस श्रेणी में आते हैं। पर कुछ लोग तो स्वभावतः ही अलग होते हैं , उन्हें इसके लिए किसी शारीरिक श्रम और तकनीक की आवश्यकता नहीं होती। बस वह तो अपनेआप ही हो जाता है। कभी-कभी ऐसे लोग सामाजिक बदलाव लाने वाले नींव के पत्थर साबित होते हैं। और ऐसे लोगों को कुछ लोग अपना आदर्श बनाकर उन्हें फोलो करने लगते हैं।
आज जब से मैं निशा से मिली हूँ न जाने क्यों ये सब सोचने पर मजबूर हो गयी। निशा मेरे बचपन की सहेली है कई सालोइ बाद आज बाज़ार में उससे मिली तो खुशी का ठिकाना न रहा लेकिन वह उतनी खुश नहीं लग रही थी। मैंने कारण पूछा तो वह उस समय टाल गई लेकिन मैं उसे लेकर पास के कॉफ़ी शॉप में गयी। जहाँ हमने ढेर सारी बातें की और जो बातें वह टाल रही थी वहाँ उसने अपना दिल खोल कर रख दिया उसने जो बताया उस पर यक़ीन करना बहुत मुश्किल था उस वक़्त के लिए। लेकिन अभी जब मैं उसके बारे में सोच रही हूँ तो लग रहा है कि इसमें कुछ भी तो नया नहीं है अक्सर ऐसा ही तो होता है।
कॉलेज में या कहें कि स्कूल से ही निशा और राहुल साथ-साथ थे लेकिन बचपन का यह साथ दोस्ती की पकड़ से छूट कर प्यार में बदल गया उसका एहसास निशा और राहुल को बाद में हुआ लेकिन पूरा कॉलेज तो कब का यह जान चुका था। और मैं भी जब कभी उन्हें इस बात का एहसास दिलाने की कोशिश करती तो वे इसे मज़ाक समझते। लेकिन एक दिन निशा की शादी की बात उसके परिवार में हुई और लड़के वाले देखने आये तो निशा मेरे पास आई और बोली “मैं राहुल से प्यार करती हूँ और उसके बिना किसी और के साथ ज़िन्दगी बिताना मेरे लिए पॉसिबल नहीं है।” अचानक हुई इस बात से मैं भी चौंक गई ख़ैर मैंने सहेली होने का फ़र्ज़ निभाते हुए राहुल को फोन करके बुलाया और तब उस दिन दोनों ने स्वीकार किया कि वे एक –दूजे के लिए बने हैं और कभी अलग नहीं होंगे। और उसके बाद तो उनका प्यार बढ़ता ही गया।
ये सब कुछ एक फिल्म जैसा था मेरे लिए लेकिन यह एक हकीकत थी और चूँकि दोनों अलग-अलग जाति के थे दोनों के माता-पिता शादी के लिए तैयार नहीं थे लेकिन आज के गरम खून के बहाव को रोकना पुरानी पीढ़ी के बस की बात नहीं थी और उन दोनों ने कोर्ट में जाकर शादी कर ली और उसकी साक्षी बनी मैं। मेरी माँ ने मुझे इसके लिए बहुत डाँटा लेकिन मुझ पर कोई असर न था आख़िर मैं भी तो नई पीढ़ी का ही एक हिस्सा थी। मैं बहुत खुश थी कि मेरी वजह सेस मेरे दोस्तों का जीवन पूर्ण हुआ।
शादी के तुरंत बाद वे दोनों शहर छोड़कर चले गए,  ये सोचकर कि अपने नये जीवन की शुरुआतवे एक नये शहर से करेंगे और पिछले पाँच सालों से मेरा कोई संपर्क नहीं रहा उनसे। पाँच सालों बाद आज हम मिले। आज उसे देखते ही मुझे लगा कि ये अब वह पुरानी चहकती निशा नहीं रही। हमेशा खुश रहने वाली मेरी सहेली बहुत गंभीर और ज़िंदगी से निराश जान पड़ती है। कारण था कि शादी के बाद जैसे-जैसे परिवार बना और ज़िम्मेदारियाँ बढ़ने लगी प्यार न जाने कहाँ काफ़ूर हो गया। उसकी एक बेटी भी है जो अभी चार साल की है। उसने बताया कि राहुल और उसके बीच वह प्यार नहीं रहा जो कभी हुआ करता था। अब तो वे बात-बात पर झुँझलाते हैं और लड़ते भी हैं। दोनों ही पढ़े-लिखे हैं, स्वावलंबी हैं और स्वतंत्रता भी चाहते हैं। लेकिन पुरुष प्रधान समाज में नारी की स्वतंत्रता कहाँ संभव है?  शादी होते ही, पति बनते ही न जाने क्या हो जाता है कि वह सम्पूर्ण स्त्री पर अपना अधिकार जताने लगता है और उसे भी अपनी सम्पत्ति समझने लगता है। वह प्यार जो दोस्ती और बराबरी से शुरु हुआ था शादी के बाद अधिकार में बदल गया। यह बदलाव अरेंज मैरिज में  ही नहीं होता बल्कि प्रेम विवाह में भी ऐसा ही होता है। मैंने देखा हे मेरे माँ-पिताजी और उनके जैसे न जाने कितने ही दम्पत्ति पति-पत्नी तो हैं, जीवन-साथी तो हैं लेकिन सिर्फ़ नाम के। उनका जीवन मुझे समझौते और जिम्मेदारी के सिवा कुछ नहीं लगता।
आज जब मैं खुद को देखती हूँ , खुद के बारे में सोचती हूँ तो खुश होती हूँ  अपने फैसले पर  हालाँकि इसके लिए मुझे बहुत लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी और आज तक भी लड़ रही हूँ क्योंकि भारतीय समाज में शादी न करने का फैसला वह भी एक लड़की का आसान नहीं है। और उससे भी मुश्किल तो ये बात कि अपने किसी दोस्त के साथ बिना शादी किए रहना लेकिन पिछले तीन सालों से मुझे या मनीष को कभी एक पल के लिए भी यह अफ़सोस नहीं हुआ कि हमने ग़लती की है या कर रहे हैं हम दोनों अलग होके भी एक हैं और एक होकर भी अलग। हम दोनों के बीच कोई समझौता नहीं है बल्कि आपसी समझ है हम ने मिलकर एक घर बनाया है मकान नहीं। मैंने एक अनाथ बच्ची को गोद भी लिया है और यह मेरा फैसला था इसलिए मैं ही उसकी ज़िम्मेदारी भी उठाती हूँ। मनीष इसके लिए बाध्य नहीं है। अगर वह उसके लिए कुछ करना चाहता है तो कर सकता है। मनीष का मुझ पर अधिकार नहीं है बल्कि प्यार है जिसका एहसास वह समय समय पर करवाता रहता है। हमारे संबंध सिर्फ़ मन तक नहीं है बल्कि यह प्यार मन ही से तन तक भी पहुँचता है और यह स्वाभाविक है कि प्रेम हालाँकि एकअनुभूति है जिसे सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है लेकिन इसका इज़हार भी ज़रूरी है और इसमें कभी-कभी मन के साथ तन का मिलना भी ज़रूरी है। और मुझे और मनीष को इसमें तनिक भी असहजता या असाधारणता नज़र नहीं आती। लेकिन  हमारे परिवारों को ये स्वीकार्य नहीं है और सिर्फ  परिवार ही नहीं बल्कि हमारे भारतीय समाज को भी इसमें शर्म आती है आख़िर क्यों ? क्योंकि इसमें स्त्री पर अंकुश नहीं है या कि फिर अपनी अर्धांगिनी बनाने के बहाने उसके स्व को छिन्न-भिन्न करना जिसमें वह अपनी मर्ज़ी से सोचने तक का अधिकार नहीं पाती है ।

बहुत सवाल हैं मेरे पास शायद इन्हीं सवालों के जवाब ढ़ूँढने की कोशिश में हूँ और इस समाज के विपरीत दिशा में सोचने ही नहीं बल्कि चलने के कारण मैं साधारण सी लड़की होके भी भीड़ से अलग हूँ और मुझे इसका गर्व है।
रश्मि शर्मा

Monday, 16 March 2015
नानी बाई रो मायरोगुजरात और राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोक-आख्यान हैबीती तीन-चार सदियों में नरसी जी
 के जीवन के इस प्रसगं ने नरसी से अलग अपना एक स्वतंत्र चरित्र, एक स्वायत्त स्वरूप ग्रहण कर लियाइस आख्यान को बार-बार रचने और तरह-तरह से कहने और गाने वालों में से बहुतों को पता भी नहीं है कि नरसिहं महेता भक्तिकालीन साहित्य के प्रसिद्ध कवि भी थे और उन्होंने वैष्णव जन तो तेहेने कहिए, जे पीड  परायी जाणे रे‐’ जैसे प्रसिद्ध पद की रचना की थीआगे चलकर जिसे गुजरात के ही एक और महात्मामहात्मा गाँधी ने अपनी प्रार्थना सभाओं में गाया थालोक मे नरसी जी का भातगाने वालों को इस बात से प्रायः लेना-देना नहीं है कि नरसी कवि थे या  नही थे उन्हे  तो लनेा-देना है नरसी नाम के उस गरीब पिता से जिसके पास अपनी बेटी की बेटी के विवाह में भात के चार कपड़े ले जाने लायक पूंजी भी नहीं थी और इस कारण उसे घोर तिरस्कार झेलना पडा़ थाइधर गांव मे अपने भाई-बंधुओं द्वारा उपहास उड़ाया जाना और उधर समधी पक्ष द्वारा अपमानजनक टिप्पणिया  करते हुए उपहास उड़ाया जाना, लोक के कवि नरसी जी के जीवन की इस विडम्बना को अपने जीवन के बहुत करीब पाते हैयही वजह है कि वे नरसी जी के भातके माध्यम से उस प्रताडऩा को बार-बार रचते हैं. जो उन्हें गरीबी के कारण पग-पग पर झेलनी पड़ती हैउस अपमान को कहते हैं जो उन्हें अपने श्रमषील और मानवीय जीवन के बावजदू केवल इसलिए झेलना पड़ता है कि उनके पास जमा-पूजी कुछ भी नहीं हैइस आख्यान की लेाक प्रियता का दूसरा कारण बेटियों से जुडा़ पहलू है बेटियों को सुसराल में पीहर की गरीबी को लेकर जो ताने सुनने पडत़े है बात-बात में जो दबकर चलना, दबकर रहना पड़ता है, इतना दबकर कि वहा  उनका अस्तित्व ही हंसी का पात्र हेा के रह जाता हैउनके व्यक्तित्व में किस कदर हीनता आ जाती है इसका अनुमान इस लोक-आख्यान में आने वाले इस प्रसगं से लगाया जा सकता है कि जब नरसी अपने निर्धन सधियो के साथ भात के लिए पहुचंते है तो उनकी बेटी उनसे कहती है-आप यहाँ क्यों आए,  आपकी इस दषा में आना  तो मेरा और अपमान होगाभात या मामेरा-एक रष्म है जिसमें बेटी की संतानों के विवाह के अवसर पर उसके पीहर वाले ससुराल पक्ष के लिए वस्त्र लेकर जाते है। आर्थिक रूप से टूटे हुए परिवारों के लिए यह दहेज की तरह ही एक और विकराल समस्या है। भात में कितना और क्या दिया, इससे समाज में परिवार की प्रतिष्ठा बनती-बिगड़ती है। राज्य की आर्थिक नीतियों के चलते आम-जनता का जीना वैसे ही मुहाल हुआ रहता है, ऐसे में एकाएक आ धमकने वाले इस खर्चे से अनके परिवार और परेशानी में आ जाते है।  बेटी  के सुसराल पक्ष की मोटी मागं  और पीहर पक्ष द्वारा उसे कैसे भी करके पूरी न कर पाना इधर घर-घर की कहानी है। नरसी जी के भातकी लोकप्रियता की यह भी एक वजह है। पूर्वी राजस्थान में नरसी जी के भात के इतने लोकगीत हैं कि उनकी कोई  एक स्क्रिप्ट तय करना संभव नहीं है। कोई एक स्क्रिप्ट आप चुन तो सकते हैं लेकिन यह इतनी ही है और ऐसी ही है यह कहना संभव 
नहीं है। किसी और गांव में कोई  अलग रूप उसका मिल जाएगा। लोकगीत की किसी और शैली में लेकिन प्रसंग:नरसी  के भातका ही होगा, वर्णन वही होगा लेकिन कहने का ढंग , संगीत, धुन, लय, बोल सब कुछ बदल जाएगा। इसी अनोखेपन के चलते कहने का समय और स्थान भी बदल जाते है। इससे जुड़ी हुई एक और दिलचस्प बात यह है कि लोक गीत की शैली कन्हैया, ढांचा या पद जो भी हो सभी में एक समानता देखने को मिलती है कि किसी में भी गरीबी का रोना नहीं रोया गया है और गरीबी के चलते होने  वाले हृदय-विदारक तिरस्कार को जितने मार्मिक ढगं से कहा गया है, उतने ही कड़े बोलों से धन के मिथ्या-अभिमान को एक पल में ध्वस्त करके रख दिया हैऔर इस तरह गरीबी-अमीरी को महज परिस्थिति जन्य चीज वस्तु मानकर मानवीय-जीवन के होने भर की उदारता व महता को स्थापित किया है                                      प्रभात


 

 
Saturday, 24 January 2015
पाकिस्तानी सिपाही – चांदनी चौक में घर की छत पर चाँद ऐसे निकलता था जैसे मेरी घाट पर ही गिर पड़े....ओये, लाहौर के चाँद ने तो मुंह ही नहीं लगाया कभी.
हिन्दुस्तानी सिपाही – अपने-अपने चाँद बदल ले, ओये!”

हिन्दू – साब, लक्ष्मण के अकेले की बात कहाँ रही....वो किशन तो हम सबका भाई था....हम सब हिन्दुओं का भाई....उसकी बॉडी हमें ही मिलनी चाहिए....अगर तुम इन मुसलमानों को खुश करने के लिए निर्णय ले रहे हो....तो एक बात याद रखना....तुम पुलिसवाले और मुसलमान पछतायेंगे, बहुत पछतायेंगे.
मुसलमान – साब, अगर हमारी बॉडी हमें ना मिली ना....तो याद रखना....इन सबको कब्र में दफना देंगे....यह सब आ जायेंगे कब्रिस्तान में....बहुत बड़ा कब्रिस्तान है हमारा....फैमस है.”

 कितना अजीब संयोग है, दोनों ही संवादों में एक हिन्दू है तो दूसरा मुसलमान, फर्क बस एक लकीर का है, जिनके बीच लकीर है वो उसे मिटाकर भाईचारा-सोहार्द बढ़ाने की कोशिश कर रहे है और जिनके बीच किसी भी तरह की कोई लकीर नहीं वो नफरत की लकीर खींचने को बढ़ावा दे रहे है. पहला संवाद ‘विजयराज’ अभिनीत-निर्देशित फिल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ का है, तो दूसरा संवाद ‘गाँधी माय फादर’ के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके निर्देशक ‘फिरोज अब्बास खान’ की फिल्म ‘देख तमाशा देख’ का.  दोनों ही फिल्में एक-दुसरे के बिल्कुल विपरीत है. “क्या दिल्ली क्या लाहौर” बंटवारे के करीब एक साल के बाद के हालात पर है, सरहद पर अपने-अपने देश के लिए लड़ते दो ऐसे सिपाहियों की कहानी है जो बदले हालत में भूख-प्यास से लड़ते बंदूक की भाषा-गोलियों की भाषा भूलकर प्यार की भाषा सीख जाते है. वहीँ “देख तमाशा देख” एक राजनेता के विशाल कटआउट के नीचे दबकर मर गए एक गरीब आदमी की धार्मिक पहचान ढूंढने के चक्कर में भारत के राजनैतिक-सामाजिक चरित्र को उजागर करती है.
  ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ गुलजार की पंक्तियों में सरहद की लकीर को स्वीकार करते हुए कबड्डी खेलने का आह्वान करते हुए विभाजन के बावजूद भाईचारे पर जोर देती है, तो ‘देख तमाशा देख’ एक मृत व्यक्ति को सिर्फ जलाने या दफनाने की एवज में एक कफ़न के वास्ते दो कौमों के टकराव के साथ सरहद के भीतर विभाजन को दर्शाती है. जब देश के भीतर ही भाईचारा नहीं है, तो पडौसी मुल्क से भाईचारे की उम्मीद तो बेवकूफी ही होंगी. सीमा पर वो दोनों सिपाही अपने-अपने चाँद को exchange करने की बात कर रहे है, लेकिन सीमा के भीतर तो हम एक-दुसरे को expire करने में लगे हुए है.

हिन्दुस्तानी सिपाही – टाइम बता फिर?
पाकिस्तानी सिपाही – साढ़े छ:.
हिन्दुस्तानी सिपाही – ओये, हमारी घडी में तो बादशाहों सात बजे है...घडी तो आपकी ख़राब हो गई.
पाकिस्तानी सिपाही – हाँ, तुम लोग तो वैसे भी आधे घंटे आगे हो ना हमसे.
हिन्दुस्तानी सिपाही – चलो...शुकर है रब का...माने तो सही...पुतरजी...कि कहीं ना कहीं हम आपसे आगे है और आप हमसे पीछे...हैं ना...हहाहाहा.”
     
        यहाँ जो हंसी है वो किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं है, एक तरह का उपहास है, एक तरह का ताना है उन लोगो के खिलाफ़ जिन्होंने ऐसे बादशाहों का समर्थन किया जो गद्दी के खातिर ऐसी सरहद बना डाली जिससे आधे घंटे का फासला पड़ गया और अब वे ही लोग लाहौर में बैठे चांदनी चौक में कोरमे की खुशबु याद कर रहे है या चांदनी चौक में बैठे लाहौर की लस्सी याद कर रहे है. लेकिन जहाँ घडी की सुइयां सब जगह एक-सी चल रही है, एक ही वक्त दिखा रही है, वहां भी हम ऐसे ही बादशाहों का समर्थन कर रहे है जो वोट के खातिर हमारे बीच नफरत पैदा कर रहे है, हमें प्रोत्साहित कर रहे है की हम एक-दुसरे को पीछे धकेले और ऐसा करते अपना-अपना बाहुल्य स्थापित करने के चक्कर में, हम न जाने कितने अनगिनत घंटो का फासला पैदा कर चुके है.

शब्बो – गाँव में दो पार्टियों का झगडा चल रहा है.
प्रशांत – दूसरी पार्टी मतलब?
शब्बो – तुम लोगों की पार्टी.
प्रशांत – मैं कब से दूसरी पार्टी का बन गया?
शब्बो – तो फिर तू कौनसी पार्टी का है?
प्रशांत – शब्बो, मैं इस पार्टी का भी नहीं और उस पार्टी का भी नहीं, मेरी अपनी तीसरी पार्टी है.
शब्बो – तीसरी पार्टी!
प्रशांत – प्यार करने वालो की पार्टी...हम लड़ते-झगड़ते है...लेकिन प्यार से...हम करीब आने के लिए झगड़ते है...दूर जाने के लिए नहीं.”
         
         एक इतिहास का बुजुर्ग लेखक व विचारक प्रोफ़ेसर शास्त्री(सतीश आलेकर) जिन्होंने अपनी किताब में उस गाँव के जहरीले इतिहास को प्रस्तुत किया, तो उस किताब को पढ़े बगैर असामाजिक तत्वों ने उसकी सभी प्रतियों को जला दिया. एक मुस्लिम युवा लेखक जो मुसलमानों को भड़काऊ भाषण देते मौलाना(सुधीर पांडे) के खिलाफ फ़तवा जारी करता है, उसके घर को उसकी ही कौम के लोगो द्वारा जला दिया जाता है. समुन्द्र किनारे पाल पर बैठे यह दो प्रेमी प्रशांत-शब्बो जो सिर्फ एक-दुसरे से प्यार के सिवा किसी मजहब का फर्क नहीं समझते, घर से भागते वक्त प्रशांत(आलोक राजवाड़े) को मुसलमान गोली मार देते है.
         एक बेचारा गरीब किशन जो मुस्लिम औरत फातिमा(तन्वी आज़मी) का तांगा चलाते-चलाते उसे अपना दिल दे बैठता है और उससे शादी के खातिर अपना धर्म बदलकर हामिद बन जाता है और एक फातिमा, जो गाँव के बदले हालात-बवाल के लिए हर वक्त खुद को जिम्मेदार ठहराती है कि उसने किशन से शादी की ही क्यूँ?, या उसे हामिद के साथ गाँव छोड़कर चले जाना था. प्रशांत की हत्या के बाद शब्बो(अपूर्वा अरोरा) अपनी माँ फातिमा से जब पूछती है कि ‘आप मेरी और प्रशांत की शादी करवाती ना’, तो वो इंकार कर देती है. लेकिन शब्बो का अगला सवाल ‘अगर मैं भाग जाती तो’, फातिमा का जवाब था ‘मैं तुझे नहीं रोकती’. जिन सांप्रदायिक दंगो के दोषी होने का दर्द वो भोग रही है, वैसा ही दर्द वो अपनी बेटी शब्बो के हिस्से नहीं आने देना चाहती है. वो कभी नहीं चाहती कि प्रशांत इस गाँव के लिए दूसरा हामिद बने. यह सब लोग तीसरी पार्टी के लोग है जो किस मजहब से ताल्लुक रखते है कि फिकर किये बिना, अपने आप को इंसानियत के धर्म के बाशिंदे समझते है.
             आदमी ने आग खोजी. चक्का बनाया और खेती शुरू कर दी. खेतों की देखभाल के लिए उनके बीच झोंपड़ी बना ली. कुंए खोद लिए और बस्तियां बस गईं. सबकुछ सही चल रहा था तो फिर बवाल कब शुरू हुआ? जिस दिन एक आदमी ने एक डंडी उठाकर जमीन पर एक घेरा बनाया और कहा जमीन का यह टुकड़ा मेरा है और यह टुकड़ा तेरा है. टुकड़े घटते-बढ़ते गए, लेकिन फसाद लगातार बढ़ते गए. सल्तनत बनीं, मुल्क बने. इंसान हर वक्त इसी गलतफ़हमी में रहा कि अगर खुद को बाहुबली बनाना है तो अपना खुद का एक टुकड़ा होना चाहिए और इन टुकड़ो की ग़लतफहमी में इंसान धीरे-धीरे बिगड़ता चला गया, इतना बिगड़ गया कि एक दिन भूल ही गया कि वो जिन टुकड़ो के भीतर टुकड़े कर रहा है उन्हें कभी जमीन पर डंडी के घेरे की जरुरत ही ना पड़ी.
          ‘रन’, ‘देहली बेली’, ‘डेढ़ इश्कियां’ में अपने अभिनय का लोहा मनवा कर निर्दशक की ओर रुख करने वाले अभिनेता विजय राज का कहना है कि “गुलजार साहब उनके निर्देशन में बनी फिल्म क्या दिल्ली क्या लाहौरके गीत लिखने व उसके निर्माता बनने के लिए तैयार हो गए थे लेकिन यह निर्णय उन्होंने फिल्म देखने के बाद ही किया. गुलजार साहब ने उनसे कहा था कि पहले फिल्म बनाओ फिर हम देखेंगे. जब उन्हें यह फिल्म दिखाई गई तो उन्होंने इसे बहुत पसंद किया और वे इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए राजी हो गए”.
         पाकिस्तानी सिपाही रहमत का किरदार खुद विजय राज ने निभाया है, वहीँ हिन्दुस्तानी सिपाही(बावर्ची) समर्थ के किरदार में मनु ऋषि चड्ढा ने सबके चौंकाया है. इसके अलावा राज जुत्शी और विश्वजीत प्रधान भी छोटे रोल में मुकम्मल असर छोड़ते हैं. यह फिल्म बोस्निया हर्जेगोविना की फिल्म ‘नो मैंस लैंड’ की कहानी से काफी मिलती-जुलती है जिसने ऑस्कर में लगान को हराया था. वहां भी दो अलग पालों में खड़े सिपाही मानवीय त्रासदी का आख्यान अपनी कहानियों और संवादों के जरिए सुनाते हैं. यहां भी कुछ ऐसा ही है.
          ‘तुम्हारी अमृता’, ‘सालगिरह’, ‘महात्मा वर्सेस गांधी’, ‘सेल्समेन रामलाल’ जैसे नाटकों का सफल मंचन कर ‘गाँधी माय फादर’ फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके निर्देशक फिरोज अब्बास खान के मुताबिक़ “इस फिल्म में दिखायी गयी घटनाएं सच्ची हैं. कई साल पहले मुझे एक अवकाशप्राप्त पुलिस आयुक्त ने कहानी सुनाई थी, जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था. जब मैं अपनी पहली फिल्म बना रहा था तब भी मुझे यह कहानी फिल्म बनाने के लिए प्रेरित करती थी. अब जाकर मैं इसे बना पाया हूँ और जब तक इस फिल्म का निर्माण नहीं हो जाता उनकी अंतरात्मा पर बोझ बना रहता”.
          फिल्म में सतीश कौशिक ने अवसरवादी राजनेता की भूमिका निभाई है जो स्थानीय अख़बार के मालिक भी है. वहीँ हिंदू नेता बांडेकर के रोल में शरद पोंक्शे व मुस्लिम नेता सत्तार भाई के रोल में जयवंत वाडेकर का अभिनय प्रशंसनीय है जो अंत में पूरा मामला निपट जाने के बाद नाव में एक-दुसरे से हाथ मिलाते हुए हँसते हुए दिखाई पड़ते है. विनय जैन पुलिस अधिकारी विश्वासराव के रूप में, पुलिस इंस्पेक्टर सावंत के रूप में गणेश यादव का अभिनय सहज महसूस होता है.

और अंत में गुलजार की पंक्तियाँ....

“लकीरें है, तो रहने दो....
किसी ने रूठ कर....
गुस्से में शायद, खींच दी थी....
इन्ही को बनाओ अब पाला...
और आओ, कबड्डी खेलते है....
मेरे पाले में तुम आओ, मुझे ललकारो....
मेरे हाथ पर तुम हाथ मारो, और भागो....
तुम्हे पकडू, लिपटू....
और तुम्हे वापस ना जाने दूं....
लकीरें है, तो रहने दो....
किसी ने रूठ कर....

गुस्से में शायद, खींच दी थी....”         - तनुज व्यास

Monday, 5 January 2015
यह तस्वीर किसी भी दर्शक को पहली झलक में ही खुद से बाँध लेने का माद्दा  रखती है। प्रथम दृष्ट्या ही ये तो अनुमान हो जाता है की ये तस्वीर अपने जेहन में कही कही कोई बहुत गहरी बात समेटे है, इस कृति की कर्ता  कुछ तो गूढ़ सन्देश पहुंचाना चाहती हे अपनी कुंची से। पर क्या? आखिर वो कौनसी  बात है जो चित्रकार इस चित्र में बताना चाहती है?  एक बेरंग सफ़ेद औरत के वृतचित्र में निहित करके क्या समझाने का प्रयत्न किया जा रहा है? इन सभी क्या का जवाब जानने के लिए दर्शक को काफी देर मननशील हो इस तस्वीर को एक टक  निहारना पड़ेगा , कुछ सोचना पड़ेगा। काफी देर तक इस सांकेतिक चित्र को दार्शनिक दृष्टी से देखने पर में इतना समझ पाया की ये चित्र एक पश्चिमी पौराणिक कथा को दृष्टिगत रखते हुए खिंचा गया होगा। ये कथा है इस संसार के प्रथम नर और नारी की , ये कहानी है आदम और ईव की। अगर चित्र के मर्म को समझना है तो उस प्रसंग का उल्लेख आवश्यक है। कथा कुछ यु है की, ईश्वर  ने जब सृष्टि की रचना की तो प्रथम नर का सृजन किया , वो नर था आदम एवं हर क्षेत्र में उसका सहयोग करने की लिए ईव नामक नारी की रचना की। तत्पश्चात ईश्वर  ने एक सुन्दर उपवन की रचना जिसे बाइबिल में " गार्डन  ऑफ़ इडन " कहा गया है।  उसमे विविध प्रकार के सुस्वाद फलयुक्त वृक्ष लगे थे, भगवान् ने आदम ईव को एक विशेष पेड़ के एक फल विशेष ( बाइबिल के अनुसार " ट्री  ऑफ़ नॉलेज ओफ गुड एंड ईविल " ) को खाने से मना किया। भगवान् के जाते ही वहा एक सांप ( बाइबिल के अनुसार सैतानआकर आदम से वो फल खाने को बोलता है परन्तु आदम मना कर देता है, फिर सांप ईव के पास जा कर उसे फल खाने को उकसाता है , ईव नारी सुलभ चंचलता दिखाते हुए फल खा लेती है, तथा आदम से भी खाने को कहती है।  आदम खाने से मना करता है परन्तु त्रिया हठ  के आगे तो त्रिदेव हार गए आदम की क्या बिसात थी, सो उसने भी वो फल खा लिया।
फल खाते ही उनके वस्त्र गायब हो गए ( शायद इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए चित्र में ईव को निर्वस्त्र दिखाया गया है ) , उसी समय ईश्वर  का प्राकट्य होता है एवं वे सभी को श्राप देते है , सांप को मनुष्य जाती का शत्रु बन जाने का ( जो की सांप आज तक है ) , आदम को हमेशा संघर्ष करने का एवं चूँकि ईव सबसे ज्यादा गुनाहगार थी , उसे इश्वर ने श्राप दिया की तुम्हे प्रसव पीड़ा सहन करनी होगी एवं पुरुष हमेशा तुम पर अधिकार जमा कर रखेंगे। ये कहानी तो यही समाप्त होती हे , परन्तु यहाँ आरम्भ होती है नारी पर अत्याचार की कभी समाप्त होने वाली कहानी ......उस पर पुरुष के अधिकार की कथा ....सदियों से चली रही स्त्री को भोग की एक वास्तु मात्र मान लेने की परंपरा। चित्रकार ने अपने चित्र में नारी की वाही पीड़ा उभारने  का प्रयास किया है जिस में वो काफी हद तक सफल प्रतीत होती है। इसमें उन्होंने सांकेतिक रूप से ये प्रश्न उठाने  की कोशिश की है की आखिर क्यूँ नारी को हर गलती का जिम्मेदार ठहराया जाता है , आखिर क्यूँ पुरुष नारी को प्रताड़ित करने , उसे अपनी किसी निजी संपत्ति की तरह भोग करने को खुद का ईश्वर प्रदत्त जन्मसिद्ध अधिकार मान बैठा है। चित्र में उकेरी गयी नारी आज की सरती जाती का प्रतिनिधित्व करती है , अन्याय से दुखी भग्न ह्रदय को ईव की आधी खायी सेब से प्रदर्शित किया है तो वही  हर पीड़ा सह सह कर बेरंग हो चुके नारी जीवन को दर्शाने के लिए चित्र में नारी को स्वेत रंग में दिखाया है। अधकटे  दिल को विपरित दिशा में दिखा कर भी भरी व्यंग्य किया गया है जो की दर्शक की मनन शक्ति के अनुरूप अपना अर्थ बदलता है। चारो और रक्तवर्ण से युक्त प्रतिवेश आज के असुरक्षित एवं भयपूर्ण परिवेश को इंगित करता है। आज जब चारो और नारियो पे हो रहे अत्याचार चरम परहै तो यह चित्र विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। आस पास शांति की दया याचना करने स्वेत पंखो के भावो की यदि शब्दों में रूपांतरित किया जाए तो उनकी प्रतिध्वनि शायद येही कहे की 
नारी तेरी यही कहानी , आँचल ,में दूध आँखों में पानी 

                                                                                             सुरेंदर पाल सिंह